
Vimala Devi
मेरे रिश्ते जैसे पति, बच्चे इन्हीं के बिच रहना मेरी मजबुर बनी है।
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मेरे रिश्ते जैसे पति, बच्चे इन्हीं के बिच रहना मेरी मजबुर बनी है।

विमला जी, आपने बात को बड़ी ईमानदारी से रख दिया। पर एक बार खुद से पूछिएगा, पति और बच्चों के साथ रहना मजबूरी है, या यही वह जगह है जहाँ आप खुद को देखने से बचने का बहाना बना रही हैं। दुर्गाबाई ने भी रिश्ते नहीं तोड़े, परिस्थितियाँ नहीं बदलीं, उन्होंने उन्हीं के बीच अपना रास्ता बनाया। रिश्ता मजबूरी नहीं है, रिश्ते को मजबूरी मान लेना अपनी ही सुविधा है, ताकि कुछ नया करने का जोखिम न उठाना पड़े। घर वही रहेगा, लोग वही रहेंगे, सवाल यह है कि उनके बीच रहते हुए आप अपने लिए क्या खड़ा करती हैं।