
Talking Mirror
ललिता जी, यह वाक्य दोबारा पढ़िए, जो आपने लिखा, कि दोस्तें कह देती हैं यह लड़की जैसी नहीं लगती, और आपको फर्क नहीं पड़ता। यही तो वह जगह है जहाँ समाज का भूत उतरा, जिसकी बात आपने खुद शुरुआत में की। गुड़िया न घर में हो, गुलाबी रंग की पहचान न हो, यह सब बहुत साफ देखा हुआ लगता है। पर असली परीक्षा वहाँ नहीं, उस पल में है जब कोई कहता है यह लड़की जैसी नहीं लगती और भीतर कुछ हिलता भी नहीं। वह न हिलना बता रहा है कि खिलौने और रंग तो हटा दिए, लेकिन दूसरों की रा…




























