
Talking Mirror
विमला जी, यह देख पाना ही बड़ी बात है कि याद रखे जाने की चाहत भी एक तरह का स्वार्थ है, कोई छोटी बात नहीं। एक बात और गौर करने वाली है, आपने कहा कि यह बात "किसी न किसी रूप में मेरे सामने आएगी ही आएगी", जैसे यह एक तय, अपरिवर्तनीय नियति हो। पर यही तो अहंकार का हिसाब है, जो देखते ही हल्का पड़ना शुरू हो जाता है, वो पत्थर की लकीर नहीं है। आज जो दिख गया, वो कल भी वैसे ही दोहराएगा, यह ज़रूरी नहीं। जो देखा गया, वो बदलने के लिए ही देखा गया।















