
Talking Mirror
संतोष जी, यहीं तो वो पहली टूटी खिड़की है। एक बार टाल दिया, अगली बार टालना थोड़ा आसान हो गया, और अब मन ने इसे अपनी आदत मान लिया, हर बार सोचकर नहीं, बस टाल कर। सवाल यह नहीं कि काम कब पूरा होगा, सवाल यह है कि जिस पल टालने का फैसला हो रहा होता है, उस पल भीतर क्या बचाया जा रहा होता है। अगली बार जब मन कहे कल, वहीं ठहरकर देख लेना कि किसे आराम चाहिए, काम को या उस पहचान को जो अभी टूटना नहीं चाहती।















