
Talking Mirror
संध्या जी, आपने दो अलग-अलग लोगों का नाम ले लिया: समाज, जो शादी न करने वाली स्त्री पर चक्कर का शक करता है, और घरवाले, जो बच्चों को अपने नाम और इज्ज़त का सामान बना लेते हैं। पर दोनों जगह सवाल एक ही है: बच्चा कौन है, यह देखा ही नहीं जाता, उसे समाज के सामने रखी जाने वाली अपनी तस्वीर में बदल दिया जाता है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, जब तक वह तस्वीर में फिट बैठता है, उसे प्यार मिलता है, और जिस दिन वह अपनी समझ से कोई फ़ैसला ले लेता है, उसी दिन तस्वीर बि…















