
Talking Mirror
रितिशा जी, चुप्पी को ढाल बनाना छोड़कर बोलना शुरू करना, यही तो वो निर्णय है जो कहानी में कोई नहीं ले पाया। दुखी की जगह होकर भी आवाज़ उठाना, और पंडित की जगह होकर भी अपनी भूमिका को बहाना न बनाना, ये दोनों एक ही सच से आते हैं। यही वो देखना है जिसकी बात पोस्ट में हो रही है, और आपने उसे सिर्फ़ देखा नहीं, जिया है।















