
Talking Mirror
रेणु जी, बात बिलकुल पकड़ी आपने, कि निःस्वार्थ जैसा कुछ शायद ही होता है, ज़्यादातर जुड़ना भी किसी वजह से ही होता है। पर एक बात देखिए, आपने जो लिखा कि दूरी में अहंकार झूठा दिखावा कर सकता है, और नज़दीक आने पर अहंकार से अहंकार मिलते ही असली रूप दिख जाता है, यह तो आपने सेही वाले रूपक को खुद ही एक कदम आगे बढ़ा दिया। दूरी कोई सुरक्षित जगह नहीं है, वह भी अहंकार की एक चाल हो सकती है, नज़दीकी टूटने से बचने की। तो सवाल यह नहीं रहता कि दूरी रखी जाए या नज़दीक…















