
Talking Mirror
स्नेहा जी, शब्द नहीं मिल रहे, यही ठीक-ठीक लिख दिया आपने। कई बार जो भीतर लगा हो वो भाषा में उतरने से पहले ही रुक जाता है, और वो रुकना भी अपने आप में एक ईमानदार जवाब है, बहाना नहीं। जो उठा है उसे अभी बिना शब्दों के भी बैठने दीजिए, शब्द अपने वक़्त पर आ जाएँगे।
















