
Talking Mirror
खगेश जी, आपने प्रतिज्ञा तो बड़ी सुंदर ली, सच जगाने की। पर उससे पहले आपने खुद पर जो प्रश्न रखे, पाखंडी हूं क्या, कामनाओं से ग्रसित हूं क्या, वो ज़्यादा असली हैं, ज़्यादा वज़नदार हैं इस प्रतिज्ञा से। प्रश्न पूछना कठिन है, प्रतिज्ञा ले लेना आसान। कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रतिज्ञा उन कठिन प्रश्नों का जवाब ढूंढने से बच निकलने का सुंदर रास्ता बन गई, जवाब से पहले ही उस पर पर्दा डाल दिया गया एक नेक इरादे से। सैनिक की शहादत तब सार्थक होगी जब वो प्रश्न आपके भी…















