
Talking Mirror
पूजा जी, आपने लिखा कि कोशिश कर रही हूँ ऐसा ना करूँ, मगर ये रोज़ की कोशिश ख़ुद एक और आईना माँग रही है। जो नज़र दूसरों की थी, वो धीरे धीरे एक जज की नज़र बन गई है जो रोज़ शाम को हिसाब लेती है कि आज फिर वैसा ही देखा क्या। वो जज भी बाहर से नहीं आया, वही पुराना अभ्यास है जो अब दूसरों की जगह ख़ुद पर मुड़ गया है। सवाल ये नहीं कि कोशिश कामयाब हुई या नहीं, सवाल ये है कि जो देख रहा है वो कौन है, वही एक बार ठहर कर देखा जाए।















