
Sangeeta Devi
पहले मैं सोचती थी कि सब लोग मेरी प्रशंसा ही करें इसलिए मैं सब की बातों में बिना तर्क दिए हां में हां मिलाती रहती थी और परिणाम ये होता था कि लोग पीठ पीछे से मेरी बुराई ही करते थे और सुनकर बहुत ज्यादा दुःख होता था। आचार्य जी को सुनती हूं पुस्तकें पढ़ती हूं तो एक आत्मविश्वास जगा है। अब मैं बातों में तर्क देती हूं जूझती हूं तो लोग सामने से बुरा कहते हैं लेकिन अब दुःख नहीं होता क्योंकि अब डर नहीं लगता धन्यवाद आचार्य जी















