
MaNorama Vyas
अब समझ में आता है कि “मैं कौन हूँ?” का उत्तर तय कर लेना आसान है, लेकिन उस उत्तर पर प्रश्न उठाते रहना ही वास्तविक खोज है। जब तक मैं अपने बारे में किसी धारणा को पकड़कर बैठी हूँ, तब तक मैं स्वयं को नहीं, बल्कि अपनी बनाई हुई छवि को जान रही हूँ। बुल्लेशाह का खुला प्रश्न मुझे इसी पकड़ से मुक्त होने की दिशा दिखाता है—“मैं कौन हूँ?” का उत्तर पकड़ना नहीं, बल्कि हर झूठे उत्तर को पहचानकर छोड़ते जाना ही आत्म-अवलोकन की शुरुआत















