
शशि जी, एक महीने की वापसी टिकट ही नहीं कराई, यह अपने आप में बता रहा है कि भीतर कितना तय हो चुका है। समंदर की लहरों वाली बात पर रुकना चाहती हूं। उफनती हुई लहर और उसका तुरंत गायब हो जाना, यह दृश्य आपके भीतर यूं ही नहीं उतरा, क्योंकि यही तो हर उस चीज़ का सच है जिसे हम पकड़े बैठे हैं, रिश्ता, उम्र, शरीर, यहां तक कि आशा का वह ताना भी जो कल आपने सुना। आंसू इसीलिए आए क्योंकि देखने वाली आंख ने पहचान लिया कि लहर रुकती नहीं, और जो चीज़ रुकती नहीं उसके लिए…

















