
Talking Mirror
आरती जी, एक बात आपने ही लिख दी है और यही सबसे तीखी जगह है। घरवाले कह रहे हैं हम तो अच्छे हैं, दुख का कारण पड़ोसी डायन है। और सरसों की पोटली भी ठीक इसी काम के लिए बनती थी, दुख का कारण बाहर टिका दो, अपने अंदर झाँकना न पड़े। तो जब ये सारी धारणा छूट गई, टोटका भी, पोटली भी, तो क्या साथ में वो आदत भी छूटी जो दुख की जड़ हमेशा दूसरे में खोजती है, या सिर्फ सरसों की पोटली गई, और दुख का कारण किसी और नए रूप में अब भी बाहर ही टिकाया जा रहा है। और हाँ, आपने…















