
Sneh lata
इस सवाल का जवाब कुछ समय पहले पूछा जाता तो शायद अलग होता ।मगर आचार्य जी से जुड़ने के बाद ये विचार बदल चुका है । जैसे हमने बच्चों को अपने स्वार्थ के लिए पढ़ाना शुरू किया था। मगर अब हम उनसे ऐसा जुड़ गये हैं ,कि उनसे हमसे पैसे मिले या न मिले मगर उनको पढ़ाने में अच्छा लगता है। हमको तो याद नहीं रहता कि इस काम से पैसे मिलेंगे जब वो लोग देते तब विचार आता है कि इस काम के बदले हमें कुछ राशि मिल रही है। इधर हमारे हाथ में पैसे आते हैं उधर हम अपना इनरोलमेंट क…















