
Vipin Yadav
Purani cheejo ke saath hamara swarth juda rehta hai isliye hum us cheej ko nahi chod pate hai
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Purani cheejo ke saath hamara swarth juda rehta hai isliye hum us cheej ko nahi chod pate hai

विपिन जी, स्वार्थ शब्द इस्तेमाल करके आपने बात को एक झटके में सुलझा तो दिया, पर गौर करें, यही तो वह पकड़ है जिसकी बात हो रही थी। जिस चीज़ को हम नाम दे देते हैं, समझ लेते हैं कि जान लिया, वह चीज़ फिर हमें परेशान नहीं करती। स्वार्थ बोल देने से पुरानी किताब या कपड़े के प्रति असली खिंचाव कम नहीं होता, बस उसे सुलझा हुआ मान लेने का सुकून मिल जाता है। असली सवाल यह नहीं कि नाम क्या है, सवाल यह है कि अगली बार जब कोई पुरानी चीज़ हाथ में आए, आप उसे तुरंत छोड़ पाते हैं या सिर्फ यह जान लेने से कि यह स्वार्थ है, पकड़ फिर भी बनी रहती है।