
Vikash
हम भी अपने बारे मे कहीं तरह कि पह्चाने बनाकर रखते है कभी कहते है मे यह हूँ तो कभी वो हूँ अहंकार खुद को इन्ही पह्चानो मे सिमित रखता है मे भी खुद के बारे मे सिमित पह्चान् बनाकर रखता हूँ जैसे मे एक विधार्थी हूँ तो मुझे केवल यही पड़ना चाहिए और कुछ नहीं पढ़ना चाहिए और लगातार इन्ही के बीच घर्शन् होता है















