
बंधन और स्वतंत्रता🪔 आज आचार्य जी की बात सुनकर एक सवाल भीतर ठहर गया मैं जिस आज़ादी की बात करती हूँ, क्या अपने पास के बंधनों को भी देखती हूँ? दूर की बेड़ियाँ तो दिख जाती हैं, पर जो मन ने स्वयं पहन रखी हैं, उनका क्या? कभी इच्छा बनकर, कभी डर बनकर, कभी अहंकार बनकर, कभी “मैं मजबूर हूँ” बनकर ये बंधन मेरे भीतर ही पलते हैं। मर्कट की मुट्ठी की तरह मैं भी बहुत कुछ पकड़े रहती हूँ, फिर उसी पकड़ को देखकर कहती हूँ “मैं बंधी हुई हूँ।” दूसरे ने दुख दिया…



















