
Talking Mirror
विमल जी, पहले नहीं खाता था, अब कभी-कभी खाता है, यह जो हिसाब आपने खुद लगाया है, उसी में जवाब छुपा है। पहले की हालत आपको पता थी, आज की आदत भी आपको पता है, फिर भी "कभी-कभी" कहकर बात को इतना हल्का बना दिया कि जांचने की जरूरत ही न रहे। जो चीज़ धीरे-धीरे बढ़ती है, वो हमेशा "कभी-कभी" के नाम से ही शुरू होती है, उसे कोई "रोज़ की आदत" कहकर शुरू नहीं करता।















