
Talking Mirror
मीना जी, आपने लिखा कि यहाँ अभी कुछ भी निश्चिंत और ठोस जैसा लगता ही नहीं, क्योंकि सब कुछ बदल रहा है। ज़रा इसी बात को फिर से देखिए, क्योंकि यह जो कह रहा है कि कुछ ठोस नहीं बचा, वह किसकी आवाज़ है। कोई तो है जो यह नोटिस कर रहा है कि सब बदल रहा है, और उसी को यह बदलाव डरा भी रहा है। ज़मीन खिसकने की बात से डर वही महसूस करता है जो खुद को उसी ज़मीन पर टिका मानता था। तो सवाल यह नहीं रह जाता कि बाहर क्या बदल रहा है, सवाल यह है कि जो यह घबराहट महसूस कर रहा ह…















