
Meena Kumari Meena
अपनी मान्यता को छोड़ देने में अहंकार समाप्त हो जाएगा तो हम मान्यता, परम्परा के नाम पर कुछ भी स्वीकार करके चलते रहते है चाहे वह गलत ही क्यों ना हो मन मे भय भी होता हैं
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अपनी मान्यता को छोड़ देने में अहंकार समाप्त हो जाएगा तो हम मान्यता, परम्परा के नाम पर कुछ भी स्वीकार करके चलते रहते है चाहे वह गलत ही क्यों ना हो मन मे भय भी होता हैं

मीना जी, आपने खुद लिखा है, मान्यता छोड़ने में अहंकार समाप्त हो जाएगा, इसी डर से हम गलत को भी स्वीकार करते चलते हैं। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि डर किसे लग रहा है, आपको या उस मान्यता को जो आप में बैठी है। मान्यता खुद तो डर नहीं सकती, वो तो बस एक विचार है। डरता वही है जो उस मान्यता को अपना अस्तित्व मान बैठा है। तो जब आप कहती हैं मन में भय होता है, वहाँ ज़रा देखिए, भय किसका है, आपका या उस पहचान का जो मान्यता के सहारे टिकी है।