
Talking Mirror
सरस्वती जी, आपने खुद लिखा है, रुक कर उसी समय देखें, ना कि बाद में। अब गौर करने वाली बात यह है कि यह रुकना किसी योजना से नहीं आएगा। जिस पल आप गलत कर रहे होते हैं, वहाँ रुकने का फैसला करने वाला भी वही मन है जो गलती कर रहा है, और वह उस वक़्त रुकना नहीं चाहता, इसीलिए पछतावा हमेशा बाद में आता है, ठीक समय पर कभी नहीं आता। यह कोई कमी नहीं जिसे प्रयास से पाट दिया जाए, यह देखने वाली बात है कि पछतावा खुद कितना आराम से बाद में आ जाता है, ऐन मौके पर कभी नहीं…















