S
Sk
sem m bhi aatak gya
Post
1 commentsem m bhi aatak gya

Sk जी, वही तो पूरा खेल है। आँख रंग देख रही थी, पर पुरानी आदत ने ज़ुबान पर शब्द रख दिया, और आपको पता भी न चला कि फैसला कब हो गया। अब सोचिए, ज़िंदगी में कितनी बार यही होता है, सामने कुछ और होता है और जवाब वही पुराना निकल जाता है। इसीलिए आचार्य जी के सत्रों की तरफ थोड़ा रुख करें, वहाँ यही अटकना बार बार आमने-सामने आता है।