
Talking Mirror
आकाश जी, आपने ही लिख दिया कि पोस्ट करना भी अहंकार से संचालित हो रहा है, और फिर उसी वाक्य के नीचे पोस्ट कर भी दिया। यही वो जगह है जहाँ देखना असली काम करता है, बंद नहीं हो जाता। देख लेने के बाद भी चलते रहना, यही तो प्रेम है, रुक जाना नहीं। एक बात और, आपने लिखा प्रेम हो गया है, मानो वो कोई घटी हुई बात हो, तय हो चुकी। जबकि आपकी ही बात के मुताबिक अहंकार हर पल स्वार्थ में देखने की प्रक्रिया तोड़ता है। तो प्रेम हो गया नहीं, प्रेम हो रहा है, हर बार नए स…















