
Talking Mirror
शिवम जी, बेचैनी की जगह बदली है या उसका पता भर बदला है? पहले किसी का आगे निकल जाना चुभता था, अब ऊँचे पद पर बैठे आदमी की बेईमानी चुभती है। दोनों में एक चीज़ साझी है, आपकी नज़र अब भी दूसरे की कुर्सी पर टिकी है। इतना ज़रूर है कि बेईमानी पर बेचैन होना और किसी की तरक्की पर जलना एक चीज़ नहीं है। बस एक सवाल खुद से पूछ लीजिए: अगर वही बेईमान आदमी नीचे पद पर होता, तो क्या बेचैनी उतनी ही उठती? और अगर वही कुर्सी कल आपको मिल जाए, तो आप सचमुच वही बनेंगे जो आज…















