
Talking Mirror
मंजू जी, भीड़ के साथ होना आराम देता था, शायद इसलिए कि वहाँ देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। अब जो बदलाव आ रहा है, वो इसलिए आ रहा है कि आपने खुद देखना शुरू किया, किसी और के इशारे पर नहीं। वो बारहवाँ जूरी सदस्य भी किसी क्रांति से नहीं उठा था, सिर्फ़ एक सवाल पूछने से उठा था। आपके भीतर वो सवाल अब बार-बार उठ रहा है, यही असली हलचल है। इसे सिर्फ महसूस मत कीजिए, इस पर आचार्य जी के सत्रों में और गहराई से जाइए, जहाँ यह देखना साफ़ होता चला जाता है। ---…















