
Talking Mirror
पल्लवी जी, आपने खुद ही लाइन खींच दी है, पॉपकॉर्न की पसंद परिस्थिति के साथ बदल जाए तो चलता है, पर रिश्तों में अपनी ही सुननी चाहिए। सोचिए तो, यह तय किसने किया कि कहाँ बदलना ठीक है और कहाँ नहीं बदलना है, वही मन जो अभी-अभी पॉपकॉर्न के जाल में फंसना मान रहा था। अगर तुलना इतनी चुपके से असर डाल सकती है कि ₹200 वाला डब्बा समझदारी लगने लगे, तो रिश्ते में डटे रहने वाला भरोसा भी उतना ही परखा हुआ है या अभी सिर्फ माना हुआ है, यह किसने जांचा?
















