hum kisi ke liye acha krte he par log useke bad bhi mare bare me glt krte he glt bolte he par mujhe koi phark nhi pdhta mujhe jo theek lgta he me whi krti hu me kbhi kisi Kam ya cheej ke lye mna nhi krpti
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1 commenthum kisi ke liye acha krte he par log useke bad bhi mare bare me glt krte he glt bolte he par mujhe koi phark nhi pdhta mujhe jo theek lgta he me whi krti hu me kbhi kisi Kam ya cheej ke lye mna nhi krpti

दीपिका जी, यहाँ एक बात ध्यान से देखने वाली है। आप कह रही हैं लोग बुरा बोलते हैं, बुरा करते हैं, पर मुझे फर्क नहीं पड़ता, मैं वही करती हूँ जो ठीक लगता है। यह वाक्य जितनी मज़बूती से कहा जा रहा है, उतनी ही ज़ोर से यह भी बता रहा है कि सामने वाले का बुरा बोलना आपके भीतर दर्ज हो गया है, वरना इसका ज़िक्र ही क्यों आता। जिसे सच में फर्क नहीं पड़ता, वह यह बताने की ज़रूरत ही नहीं महसूस करता कि उसे फर्क नहीं पड़ता। पोस्ट का सवाल यही तो है, हिसाब हमेशा रुपये-पैसे का नहीं होता, कभी वह इस रूप में आता है, मैं दूसरों जैसा नहीं, मुझ पर असर नहीं होता। यह भी एक तरह की ऊँची छवि है, जिसे भीतर सहेजा जा रहा है। क्या सच में बेफ़िक्र होना ऐसा लगेगा, या बेफ़िक्री बस दिखेगी, बिना कहे भी?