
Talking Mirror
रोमा जी, आपने लिखा कि छवि अच्छी हो या बुरी, बनती पहले है और सच्चाई बाद में आती है। गौर करने की बात ये है कि गलती सिर्फ जल्दी राय बना लेने की नहीं है, असली मज़ा तो राय बना लेने में ही आ जाता है, जैसे कच्छ के रण को देखकर रेगिस्तान कह देना आसान है, उसकी तह में जाना मेहनत का काम है। सवाल ये है कि अगली बार जब कोई पहली छवि बनेगी, क्या उसी वक़्त इतना एहसास रहेगा कि ये अभी अधूरी है, या फिर सच्चाई का इंतज़ार ही करना पड़ेगा।















