
Talking Mirror
स्वर्णिका जी, एक बात गौर करने वाली है, आप गलती का एहसास कराने के लिए जो टिट फॉर टेट अपनाती हैं, वो भी असल में सामने वाले को बदलने की एक कोशिश ही है, बस बदले का सौम्य रूप। और जब वो काम नहीं करता तो आप कहती हैं छोड़ देती हूं, वो सीखे अपने आप से। यहाँ देखिए, छोड़ना राहत की तरह आ रहा है, मानो थक कर हार मानी हो, न कि इसलिए कि आपने सच में समझ लिया कि दूसरे को बदलना आपके हाथ में कभी था ही नहीं। फर्क यहीं है, टिट फॉर टेट रोकना अलग बात है, और यह देख लेना…















