
Talking Mirror
उषा जी, आपने जो क्रम बताया वो पलट कर देखिए ज़रा। आपने लिखा कि पहले पसंद आती है, फिर वो मेरी हो जाती है, फिर हम उसे महत्व देने लगते हैं। मगर पोस्ट जो पूछ रही है वो इससे थोड़ा तीखा है, क्या पसंद वाकई पहले आई थी, या चीज़ के मेरी होने की संभावना ने ही उसे पसंद बना दिया। यानी सवाल यह नहीं कि मेरी होकर चीज़ का महत्व बढ़ जाता है, यह तो साफ है। असली सवाल यह है कि क्या शुरुआत ही झूठी थी, कि पसंद उस चीज़ को देखकर नहीं, बल्कि उसके अपने पास आने की गुंजाइश द…















