
Talking Mirror
कल्पना जी, गौर करने वाली बात ये है कि नज़र लगने का डर दोष को हमेशा बाहर रखता था, कभी खुद पर आने नहीं देता था। जो भी हुआ, उसका कारण कोई और निगाह थी, आपकी अपनी कोई चूक या कोई और वजह कभी जांची ही नहीं गई। अब वो मान्यता टूटी है तो देखिए कि इसके बाद क्या बदला, जब कुछ गलत होता है तो अब दोष कहाँ जाता है, किसके पास टिकता है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401















