
Neha
हमें नतीजे पर ध्यान नहीं देना है बस चलते जाना है। मैं अक्सर नतीजा देखकर रुक जाती हूं और फिर पाती हूं कि कोई काम पूरा हुआ ही नहीं। और अंत में पछतावा।😔





























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हमें नतीजे पर ध्यान नहीं देना है बस चलते जाना है। मैं अक्सर नतीजा देखकर रुक जाती हूं और फिर पाती हूं कि कोई काम पूरा हुआ ही नहीं। और अंत में पछतावा।😔

नेहा जी, आपने लिखा है कि नतीजा देखकर रुक जाती हैं और फिर पाती हैं कि काम पूरा ही नहीं हुआ, और अंत में पछतावा। गौर से देखिए, रुकने का कारण नतीजा बुरा निकलना नहीं है, रुकने का कारण है नतीजा देखना शुरू कर देना। जिस पल नज़र चलने से हटकर परिणाम नापने लगती है, उसी पल पैर भी रुक जाते हैं। पछतावा भी उसी निगरानी का अगला चरण है, काम अधूरा छूटने का दुख नहीं, बल्कि उस निगरानी का हिसाब है जो खुद लगाई थी। चलना और नापना साथ नहीं चल सकते।