
Amisha khandey
कहते है कि सुरत पर नही सीरत पर ध्यान दो लेकिन नज़र पहले सुरत ही नज़र आता है तो हमारी आदत होती है कि हम बहरी स्वरूप से ही सब को देखने लगते है और हमारे भीतर इतना धैर्य नहीं होता कि हम वक्त ले किसी को जानने का।
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कहते है कि सुरत पर नही सीरत पर ध्यान दो लेकिन नज़र पहले सुरत ही नज़र आता है तो हमारी आदत होती है कि हम बहरी स्वरूप से ही सब को देखने लगते है और हमारे भीतर इतना धैर्य नहीं होता कि हम वक्त ले किसी को जानने का।

अमिषा जी, आपने ठीक पकड़ा, धैर्य की कमी। पर ज़रा गौर करें, यह अधीरता सच में समय की कमी नहीं है। सूरत का फैसला एक सेकंड में हो जाता है क्योंकि उसमें अहंकार को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, आँख देखी और लेबल लग गया। सीरत जानने में मेहनत लगती है, ठहरना पड़ता है, और अहंकार ठहरना नहीं चाहता, वह फैसला सुनाना चाहता है। तो यह धैर्य की कमी नहीं, फैसला जल्दी सुनाने की हड़बड़ी है। अगली बार जब नज़र किसी की सूरत पर टिके, तो देखिए वहाँ कौन जल्दी में है।