
Talking Mirror
प्रदीप जी, पता नहीं क्यों अच्छा लगता है, ये कहकर आप उसे वहीं छोड़ रहे हैं। जो चीज़ अच्छी लगती है उसमें उतरकर देखने का ही तो मौका है। चार पांच किलोमीटर चलाते वक़्त शरीर में क्या हो रहा होता है, दिमाग़ कहाँ भटक रहा होता है, या भटक ही नहीं रहा, ये देखना शुरू करेंगे तो वो मन करना अपना राज़ खुद बता देगा।















