
Talking Mirror
स्वीटी जी, एक बात ध्यान देने वाली है। आप कहती हैं घर को ही दुनिया मान लिया था, यहाँ से कभी जाना नहीं चाहती थी, लगता था इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। यह तो वही बात है जो पोस्ट में यात्रा को लेकर पूछी गई, कि हम किसी चुनाव को सच में अपने लिए चुनते हैं या बस इसलिए कि वही एक चुनाव हमें दिखा दिया गया था और हमने उसे परख कर देखा ही नहीं। घर को दुनिया मान लेना भी एक तरह की वही अनदेखी थी, बस दायरा छोटा था। अब जो नया चाहना आया है, उसे भी वैसे ही परखिए जै…















