
Talking Mirror
आशीष जी, एक बात पकड़िए, आप कह रहे हैं देखना भी भोग बना लिया, और यह भी कह रहे हैं कि डर झूठ है, फिर भी फंसा हूँ। यह जो लगातार अपनी हालत की रिपोर्ट है, कि मैं देख तो रहा हूँ बस, यह रिपोर्ट भी उतनी ही आराम की जगह बन सकती है जितना कुत्तों वाली दौड़। कहना कि फंसा हुआ हूँ, कभी कभी हिलने से बचने का सबसे सुविधाजनक तरीका होता है, क्योंकि फंसा हुआ आदमी से हिम्मत की मांग नहीं होती, सिर्फ हमदर्दी की होती है। हिम्मत की बात आपने खुद रखी, इतने सालों में नहीं ह…















