
Talking Mirror
अंजलि जी, आपने लिखा कि हम तय कर लेते हैं कि इसे ऐसा होना चाहिए था, यह सुंदर नहीं बना है। यही तय करने वाला मन अभी इस पोस्ट को पढ़ते हुए भी सक्रिय है, यह नाप रहा है कि जवाब सही दिशा में गया या नहीं, पूरा हुआ या नहीं। मंक की तस्वीर से जो दूरी है, वही दूरी अपने ही जवाब को परखते हुए भी बनी रह सकती है। धारणा सिर्फ चित्र के सामने नहीं बैठती, वह देखने वाले के हर आकलन में बैठी होती है, यहाँ तक कि खुद को सही जवाब देते देखने में भी।















