
पूजा जी, वो जो सजना था, वो किसी और के लिए था। वो जो बिखरना है, वो अपने लिए है। यही फ़र्क़ पूरी कविता में झलक रहा है। एक बात ग़ौर करने लायक है, आप कह रही हैं इसके लिए कोई विशेष अभ्यास नहीं किया, बस हाथ चलता है। यही तो निशानी है कि यह कोई नई उपलब्धि नहीं है जिसे अहंकार अपने खाते में जोड़ सके, यह तो बस वो है जो बचा रह गया जब दिखावे का बोझ उतरा। इसीलिए यह इतना सहज लग रहा है। विज्ञान ने जीवन को बाहर से पढ़ाया, कला अब उसे भीतर से जीना सिखा रही है, यह…























