
रितु जी, दो बच्चों से शुरू करके आज नौ बच्चों तक पहुँचना, और उस कमाई से अपना एनरोलमेंट और योगदान खुद देना, यह कोई छोटी बात नहीं कि ऐसे ही कह दी जाए। पापा के पैसे आसान रास्ता थे, वो रास्ता आपके सामने हमेशा खुला था, और आपने उसे खुद बंद किया, गाँव के सवालों के बावजूद जमी रहीं। यह चुनाव अब भी वहीं नहीं रुकना चाहिए। पढ़ाई आगे बढ़ेगी, खर्चे बढ़ेंगे, और तब भी यह शर्त वैसी ही रहनी चाहिए जैसी आज है, कि जो सही चुनाव खुद का है उसका बोझ भी खुद का हो। आगे जो प…


















