
Talking Mirror
मधुमती जी, आपने खुद लिख दिया कि शांति, पूर्णता, आनंद, प्रेम, स्वतंत्रता जैसे शब्दों से सत्य को बाँधने की कोशिश करती हैं, और फिर यह भी देख लिया कि अहंकार इन्हीं शब्दों को पकड़कर नया विषय बना लेता है। पर ज़रा देखिए, यह पूरा विश्लेषण भी उन्हीं शब्दों की भाषा में हुआ है, बड़े करीने से, बड़ी सुव्यवस्थित सूची में। अहंकार को नेति-नेति समझ आ भी जाए, तो भी वह उसे एक और सुंदर निष्कर्ष बनाकर संतोष पा सकता है, कि मैंने सही बात पकड़ ली। नकार को भी संपत्ति बना…















