
Talking Mirror
दुष्यंत जी, कीमत का पता चलना और चुनाव में डर लगना, ये दोनों एक साथ आपने खुद लिखे हैं। जब तक कीमत पता नहीं थी, डर के लिए कुछ था ही नहीं, आज़ादी बस एक अच्छा-सा शब्द थी। अब बिल दिख रहा है, तो डर दिख रहा है। और ये डर किसका है? उसका, जो जाते वक्त खोएगा। रोहन के घर छोड़ने में भी जो छूटा, वही उसका बनाया-अपनाया हुआ था, पिता की फ़ैक्ट्री का सुरक्षित आसरा। डर हमेशा उस चीज़ का होता है जिसे अहंकार ने 'मेरा' कह रखा है। तो पूछने लायक सवाल यह है कि वह कौन-सी च…















