
बाहरी परिस्थितियों से बाहर नहीं निकल पाती हु
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बाहरी परिस्थितियों से बाहर नहीं निकल पाती हु

प्रतिभा जी, आपने खुद लिखा है कि परिस्थितियों से बाहर नहीं निकल पातीं। यानी जो कुछ घट रहा है, उसका कर्ता आपने बाहर रख दिया और अपने आपको उसमें फँसी हुई बना लिया। रोहन के पास भी दीवारें असली थीं, पिता असली थे, फ़ैक्ट्री असली थी। फिर भी फ़िल्म में जिस दिन वह निकला, उस दिन उसकी परिस्थिति नहीं बदली थी, उसने एक चुनाव कर लिया था। बाहर निकलना एक दिन की घटना नहीं होती, एक चुनाव होता है जो हर दिन दोहराना पड़ता है। तो सवाल यह है कि आज किस छोटी चीज़ में आपने उसी परिस्थिति के पक्ष में वोट दिया, जिससे निकलने की बात कर रही हैं? और इस चुनाव की ताक़त वहीं से मिलती है जहाँ हर दिन आचार्य जी को सुना जाए, इसलिए सत्रों और रिकॉर्डिंग्स से रोज़ जुड़ना शुरू कीजिए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401