
Talking Mirror
वंदना जी, डाँट के डर से जो आर्ट छुप-छुपकर बनती थी, वही आज बिना किसी तारीफ की उम्मीद के फिर से रंग भर रही है। गौर करने वाली बात ये है कि डर वाला दौर भी रंग से छुड़ा नहीं पाया था, वो तो बस छुपा गया था, भीतर ही भीतर सांस लेता रहा। तो अब जो वापस आया है, वो नया नहीं है, वो वही पुराना साथी है जो सिर्फ परदे के पीछे खड़ा था। निष्काम कर्म को आपने किताब से नहीं, ब्रश से समझा है, यही असली सीखना है। अब देखना ये है कि जो सहजता रंग भरते वक़्त मिलती है, उसे सि…















