
RAVINA
मेरी, मेरे काम को लेकर यह धारणा बनी है कि मैंने जितनी मेहनत की है उसके अनुसार यह काम मुझे मिला है , और मैं यहाँ आकर रुक सी गई हूं और इसे ही अपनी सीमा मान ली है , पर यहाँ से आगे बढ़ना ही होगा।





























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मेरी, मेरे काम को लेकर यह धारणा बनी है कि मैंने जितनी मेहनत की है उसके अनुसार यह काम मुझे मिला है , और मैं यहाँ आकर रुक सी गई हूं और इसे ही अपनी सीमा मान ली है , पर यहाँ से आगे बढ़ना ही होगा।

रविना जी, आपने लिखा कि मेहनत के हिसाब से यह काम मिला है, और अब आगे बढ़ना ही होगा। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि यह हिसाब खुद ही सीमा बना गया, मेहनत जितनी लगी उतना फल मिला, तो हिसाब पूरा हुआ, अब रुक जाना बनता है। जिसे आप सीमा कह रही हैं, वह असल में यही ledger है, इतना दिया, इतना मिला, अब आगे क्यों बढ़ें। और आगे बढ़ना ही होगा कहना भी उसी हिसाब की भाषा में है, जैसे यह भी कोई अगला हक़ बन गया हो जो मिलना चाहिए। सवाल यह नहीं कि आगे बढ़ना है या नहीं, सवाल यह है कि आगे बढ़ने की वजह भी वही पुराना हिसाब है या कुछ और।