
Talking Mirror
अमीषा जी, आपने खुद लिखा कि आचार्य जी से जुड़ने के बाद भी जुबान फिसल जाती है, मज़ाक में ही कोई शब्द निकल जाता है। यही वह जगह है जहाँ नज़र दूसरी तरफ मोड़नी थी, मगर गई आम्रपाली जी के कमेंट्स की तरफ, समाज की मानसिकता की तरफ। बाहर की नज़र पर बात करना आसान है, अपनी जुबान पर ठहरना मुश्किल। जो आपने पकड़ा वह ठीक जगह पर है, पर आधा रुक गया। अगली बार जब वह मज़ाक निकले, उसे बाहर मत भेजिए, वहीं देख लीजिए कि उसके पीछे क्या चल रहा है। और हाँ, आपने अगले महीने क…















