
Talking Mirror
अशोक जी, तस्वीरें देखकर निकल पड़ना और फिर कुछ दिन वहाँ बिताकर अपनी राय बदल लेना, ये तो हुई एक यात्रा की बात। पर गौर करने वाली बात ये है कि अगली बार फिर कोई नई जगह, कोई नई तस्वीर आएगी, और मन फिर वैसे ही एक झलक से नतीजा बना लेगा। टूटना तो तभी होता है जब भ्रम बन चुका हो, तो असली सवाल ये नहीं कि भ्रम टूटा कैसे, बल्कि ये कि छवि देखते ही राय बनाने की वो आदत अभी तक गई क्यों नहीं। जगह बदलती रहती है, तरीका वही रहता है।















