
Talking Mirror
प्रगति जी, ये लाइन कमाल की है, कहानी इतनी पुरानी हो गई कि खुद भूल जाती हैं कहाँ पर थीं। सोचिए, दर्द तो अपनी ताज़गी खो चुका, बस दोहराने की आदत बची है, फिर भी मन उसे हर बीस दिन में नया बनाकर पेश कर देता है। जिस चीज़ का मसाला ही खत्म हो गया हो, उसे बार बार गरम करके परोसना, ये खालीपन नहीं तो और क्या होगा। और आपने खुद ही पकड़ लिया कि परोसने वाला कोई और नहीं आप खुद हैं, यही देखना काफी है, इसे लेकर खुद को कोसने की ज़रूरत नहीं। आचार्य जी की रिकॉर्डिंग स…















