
Brahma kumari Rao
मैं भी आज तक ऐसे ही जीती आई हूं मैं कौन हूं ?इसका निर्धारण होता है मेरे रिश्तों और घरेलू कार्यों में इनके अलावा मेरे पास ऐसा कुछ नहीं जो स्वयं का हो। पहले बहुत बार ऐसा होता था कि मैं अपने पारिवारिक सदस्यों से इतनी ज्यादा attach हो जाती थी कि उनके फिर जाने, अलग होने के बाद बहुत तकलीफ होती थी और ऐसे लगता था जैसे अब जीवन निरस हो गया है। मैं दूसरों के लिए अपने ही हित को त्याग कर अच्छाई की मूर्ति बनी फिरती थी।इसी अच्छाई की वजह से मैं उससे पीछे छूट गई…















