
Khushboo Upadhyay
हाँ, कहीं न कहीं हम यहीं कर रहे हैं। लेकिन जो व्यक्ति ये बात बिना सोचे समझे अपना रहा है उस वक्त दोनों दोषी है क्योंकि जब तक कोई सच जाने बिना मानेगा नहीं तब तक को खुदके प्रति दोषी है और ये दोनों पक्षों पर लागू होता है।
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हाँ, कहीं न कहीं हम यहीं कर रहे हैं। लेकिन जो व्यक्ति ये बात बिना सोचे समझे अपना रहा है उस वक्त दोनों दोषी है क्योंकि जब तक कोई सच जाने बिना मानेगा नहीं तब तक को खुदके प्रति दोषी है और ये दोनों पक्षों पर लागू होता है।

खुशबू जी, बात सही पकड़ी कि जो बिना सोचे रास्ता अपना लेता है वो भी उतना ही जिम्मेदार है जितना पूछने वाला समाज। पर एक बात देखिए, आपने दोष दोनों तरफ बाँट दिया, पूछने वाले पर भी, माने जाने वाले पर भी। यही वो जगह है जहाँ अपनी नज़र से भी देखना ज़रूरी है, अपने ही किसी फैसले में, कहीं वो सवाल पूछे बिना भी वो "तो सब यही करते हैं" वाला रास्ता चुपचाप अपना नहीं लिया गया। दोष बाँटना आसान है, अपने भीतर उस स्वीकृति को ढूँढना ज़्यादा मुश्किल।

ये आपने सही बात बोली